शाहजहांपुर। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। सत्ता हो, प्रशासन हो, राजनीति हो या समाज का कोई प्रभावशाली व्यक्ति—जब कोई सवाल उठता है तो उसे जनता के सामने रखना पत्रकार का दायित्व है। #खबर अच्छी लगे तो #पत्रकार #अच्छा और खबर प्रतिकूल हो जाए तो वही पत्रकार बिकाऊ, #पक्षपाती या #अपमानजनक भाषा का पात्र बन जाए, यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए #स्वस्थ व शुभ संकेत नहीं है।
पुवायां में मरीज की मृत्यु के मामले में चिकित्सक के खिलाफ दर्ज मुकदमे के बीच डॉक्टर केपी गुप्ता द्वारा पत्रकारों को लेकर सोशल मीडिया पर कथित तौर पर जिस तरह की अशोभनीय और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया, उसने पत्रकारिता जगत को आहत किया है। खासतौर पर पत्रकारों के कपड़े उतरवाने और चड्डी तक पहुंचने जैसी भाषा किसी भी सभ्य सार्वजनिक संवाद का हिस्सा नहीं हो सकती।
डॉक्टर साहब, #असहमति का अधिकार आपको भी है और #पत्रकार को भी।
यदि किसी खबर में आपका पक्ष नहीं लिया गया था, तो आप संबंधित पत्रकार से बात कर सकते थे। अपना पक्ष भेज सकते थे। खबर का खंडन कर सकते थे। प्रेस वार्ता में शालीनता से या क
अपना पक्ष रख सकते थे। लेकिन असहमति का जवाब व्यक्तिगत और अश्लील शब्दों से देना न पत्रकारिता की मर्यादा है और न ही सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्ति के पद की गरिमा के अनुरूप। इससे तो अच्छा था आप कानूनी कार्रवाई करते। आपने तो टिप्पणी से पूरे पत्रकारिता समाज का आहत कर दिया।
यह भी समझना होगा कि पत्रकार किसी के #व्यक्तिगत #कर्मचारी नहीं होते। कोई पत्रकार आपके #अच्छे कार्यों की खबर लिखता है तो वह इसलिए नहीं कि वह आपका #एहसानमंद है। उसी तरह यदि किसी मामले में आपके विरुद्ध #एफआईआर दर्ज होती है और पत्रकार उस तथ्य को खबर के रूप में सामने रखता है तो वह पत्रकार की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि उसका #पेशेवर दायित्व है।
अगर पुलिस की कार्रवाई गलत है तो सवाल पुलिस से कीजिए, खबर लिखने वाले पत्रकार से क्यों?
पत्रकार ने एफआईआर दर्ज नहीं की। #पुलिस ने की है। यदि एफआईआर गलत है तो उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया अपनाइए। यदि खबर तथ्यात्मक रूप से गलत है तो उसका खंडन कीजिए। यदि पत्रकार ने आपका पक्ष नहीं लिया तो अपनी आपत्ति दर्ज कराइए। लेकिन पत्रकारों के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना समस्या का समाधान नहीं है।
और एक सवाल डॉक्टर साहब से भी हैआप चिकित्सक हैं। समाज आपको केवल इलाज करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि शिक्षित और जिम्मेदार नागरिक के रूप में भी देखता है। सार्वजनिक जीवन और राजनीति में सक्रिय व्यक्ति से तो भाषा की मर्यादा की अपेक्षा और बढ़ जाती है।
राजनीति में आगे बढ़ना है तो #आलोचना #सुनने की #आदत भी विकसित करनी होगी। लोकतंत्र में जो व्यक्ति केवल #प्रशंसा सुनना चाहता है, वह #राजनीति का पूरा अर्थ नहीं समझ सकता।
पत्रकार को खरीदने या दबाने की मानसिकता लोकतंत्र को कमजोर करती है।
यह मान लेना कि पत्रकार केवल इसलिए खबर लिखता है क्योंकि उसे किसी से आर्थिक लाभ मिला है, पूरी पत्रकार बिरादरी का अपमान है। हां, पत्रकारिता में कमियां हो सकती हैं। किसी पत्रकार से गलती भी हो सकती है। किसी खबर में पक्ष छूट सकता है। लेकिन इसका जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए, गाली या अश्लील शब्दों से नहीं।
पत्रकारों से भी हमारी अपील है कि किसी भी विवादित खबर में सभी संबंधित पक्षों का पक्ष लेने का प्रयास करें। निष्पक्षता पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है। किसी व्यक्ति के खिलाफ खबर हो तो उसका पक्ष लेना भी उतना ही जरूरी है जितना शिकायतकर्ता का पक्ष रखना।
लेकिन पत्रकार की किसी गलती को आधार बनाकर पूरी पत्रकार बिरादरी को अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं मिल जाता।
आज सवाल सिर्फ डॉक्टर केपी गुप्ता और पत्रकारों के बीच विवाद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम सार्वजनिक संवाद की भाषा को इतना गिरने देंगे कि असहमति का जवाब चड्डी-पैंट की भाषा में दिया जाने लगे?
शब्दों की अपनी ताकत होती है। डॉक्टर के पास मरीज का शरीर सौंपा जाता है और पत्रकार के पास समाज की आवाज। दोनों से ही संवेदनशीलता की अपेक्षा होती है।
इसलिए डॉक्टर केपी गुप्ता से आग्रह है कि यदि उनके शब्दों से पत्रकार समाज आहत हुआ है तो वे सार्वजनिक रूप से अपने शब्दों पर पुनर्विचार करें और खेद व्यक्त करें। माफी मांगना किसी की हार नहीं होती। बल्कि अपनी गलती स्वीकार करने का साहस व्यक्ति के कद को और बड़ा करता है।
कलमकारों की आलोचना कीजिए, खबर पर सवाल उठाइए, पत्रकार से असहमति जताइए—लेकिन उसकी गरिमा मत उतारिए।
क्योंकि पत्रकार की #कलम से असहमति हो सकती है, लेकिन कलमकार का सम्मान #लोकतंत्र की आवश्यकता है।
और अंत में पत्रकार साथियों से भी यही कहना है—हमारी ताकत किसी व्यक्ति की #कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी #निष्पक्षता है। खबर लिखते समय न किसी के #दबाव में आएं, न किसी के प्रभाव में। तथ्य सामने रखें, सभी पक्षों को स्थान दें और यदि कोई पत्रकारों को धमकाता या अपमानित करता है तो उसका जवाब भी कानून, तथ्य और लोकतांत्रिक तरीके से दें।
कलम झुकनी नहीं चाहिए, लेकिन कलम की भाषा भी मर्यादा नहीं छोड़नी चाहिए। यही पत्रकारिता की असली ताकत है।"
Post a Comment