मुंबई:आज के समय में साइकिल को एक साधारण और पर्यावरण के अनुकूल साधन माना जाता है, जिसे चलाने के लिए किसी प्रकार के लाइसेंस की जरूरत नहीं होती। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब भारत में साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य हुआ करता था।
साल 1956 के आसपास देश के कई शहरों और कस्बों में स्थानीय नगरपालिकाएं साइकिल पर नियंत्रण रखने के लिए लाइसेंस और टैक्स वसूलती थीं। उस दौर में साइकिल एक प्रमुख यातायात साधन थी और सड़कों पर इसकी संख्या तेजी से बढ़ रही थी। ट्रैफिक को व्यवस्थित करने और राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से प्रशासन ने साइकिल लाइसेंस की व्यवस्था लागू की थी।
साइकिल मालिकों को हर साल एक निश्चित शुल्क जमा करना होता था, जिसके बदले उन्हें एक छोटा धातु का टोकन या प्लेट दी जाती थी। इस टोकन पर एक नंबर अंकित होता था, जिसे साइकिल पर लगाना अनिवार्य था। यह टोकन इस बात का प्रमाण होता था कि साइकिल का लाइसेंस वैध है और उसका टैक्स जमा किया गया है।
अगर कोई व्यक्ति बिना लाइसेंस के साइकिल चलाते हुए पकड़ा जाता था, तो उसे जुर्माना भरना पड़ता था। उस समय यह नियम काफी सख्ती से लागू किया जाता था, खासकर बड़े शहरों में।
समय के साथ जैसे-जैसे मोटर वाहनों की संख्या बढ़ी और साइकिल का उपयोग अपेक्षाकृत कम होता गया, वैसे-वैसे यह नियम अप्रासंगिक हो गया। प्रशासन ने इसे धीरे-धीरे समाप्त कर दिया, जिससे आम लोगों को राहत मिली।
आज साइकिल चलाने के लिए किसी भी प्रकार के लाइसेंस या टैक्स की आवश्यकता नहीं होती। यह बदलाव न केवल लोगों क सुविधा के लिए किया गया, बल्कि साइकिल को बढ़ावा देने के लिए भी जरूरी था, क्योंकि यह एक सस्ता, स्वास्थ्यवर्धक और पर्यावरण के लिए सुरक्षित साधन है।
इस तरह 1956 के दौर का साइकिल लाइसेंस आज इतिहास क एक दिलचस्प हिस्सा बन चुका है, जो हमें बताता है कि समय के साथ नियम और व्यवस्थाएं कैसे बदलती रहती हैं।
संवाददाता जावेद शेख।
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