FIR को लेकर आमने-सामने: रोहित पवार और डीसीपी डॉ प्रवीण मुंडे के बीच बढ़ा विवाद




संवाददाता जावेद शेख 

मुंबई:महाराष्ट्र की सियासत में उस समय नया मोड़ आ गया जब एनसीपी विधायक रोहित पवार ने एक विमान दुर्घटना मामले में एफआईआर दर्ज कराने की मांग को लेकर पुलिस का दरवाजा खटखटाया, लेकिन मुंबई पुलिस ने मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम में ज़ोन-1 के डीसीपी डॉ. प्रवीण मुंडे की भूमिका चर्चा का विषय बन गई है।
बताया जा रहा है कि हाल ही में हुई एक विमान दुर्घटना को लेकर रोहित पवार ने संबंधित एजेंसियों और कंपनी के खिलाफ लापरवाही का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में गंभीर चूक हुई है और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।
लापरवाही का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस
मामले में गंभीर चूक हुई है और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।
इसी मांग को लेकर वे मुंबई के मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन पहुंचे और लिखित शिकायत सौंपी।
पुलिस ने FIR दर्ज करने से किया इनकार
सूत्रों के अनुसार, जब रोहित पवार अपना बयान दर्ज करा रहे थे, उसी दौरान ज़ोन-1 के डीसीपी डॉ. प्रवीण मुंडे पुलिस स्टेशन पहुंचे। इसके बाद पुलिस ने शिकायत को एफआईआर के रूप में दर्ज करने से इनकार कर दिया।
पुलिस का कहना था कि मामला तकनीकी जांच और अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है, इसलिए तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। शिकायत को आवेदन के रूप में स्वीकार कर आगे की प्रक्रिया के लिए भेजा गया।
रोहित पवार का आरोप
रोहित पवार ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा किः
“जब एक गंभीर विमान हादसे में भी एफआईआर दर्ज नहीं की जाती, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद कैसे करे? आखिर किसके दबाव में यह निर्णय लिया गया?”
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश की जा रही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि मुंबई में मामला दर्ज नहीं होता, तो वे संबंधित जिले में जाकर शिकायत करेंगे।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि विमान दुर्घटना जैसे मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसियों और विमानन नियामक संस्थाओं के दायरे में आती है। ऐसे मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज करने से पहले तकनीकी रिपोर्ट और प्राथमिक जांच आवश्यक होती है।
डीसीपी डॉ. प्रवीण मुंडे की ओर से आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन पुलिस अधिकारियों का कहना है कि “कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया है।
अब यह देखना अहम होगा कि क्या इस मामले में संबंधित जिले की पुलिस या राज्य की जांच एजेंसी एफआईआर दर्ज करती है या नहीं। राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर बयानबाज़ी तेज हो गई है और विपक्ष ने भी पारदर्शी जांच की मांग की है।
यह मामला केवल एक एफआईआर का नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक जवाबदेही का बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और कानूनी कदम यह तय करेंगे कि सच्चाई किस ओर जाती है। 

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