भारतीय वाम आंदोलन के सामने आज आत्ममंथन का समय है। देश में मजदूर-किसान, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवाल लगातार गंभीर बने हुए हैं। ऐसे समय में विभिन्न वामपंथी संगठनों को अपने पुराने मतभेदों पर पुनर्विचार करते हुए साझा जनमुद्दों पर व्यापक एकता और संयुक्त संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है।
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में वैचारिक और रणनीतिक मतभेदों के कारण समय-समय पर विभिन्न धाराओं और संगठनों का गठन हुआ। इन ऐतिहासिक मतभेदों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी विचारणीय है कि क्या पुराने मतभेदों को हमेशा राजनीतिक दीवार बनाए रखना जरूरी है।
वाम नेतृत्व से सवाल है कि यदि विभिन्न संगठन अपनी स्वतंत्र पहचान और विचारधारा बनाए रखते हुए भी मजदूरों, किसानों, युवाओं, बेरोजगारी, निजीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर संयुक्त संघर्ष कर सकते हैं, तो इसकी शुरुआत क्यों नहीं की जा सकती?
वाम राजनीति में आत्मालोचना की भी आवश्यकता है। दूसरे संगठनों को अवसरवादी, संशोधनवादी या अतिवामपंथी बताना आसान है, लेकिन यह पूछना अधिक जरूरी है कि आम जनता, युवा, मजदूर और किसान अपेक्षित स्तर पर वाम आंदोलनों से क्यों नहीं जुड़ पा रहे हैं। नई पीढ़ी को नेतृत्व में पर्याप्त अवसर क्यों नहीं मिल रहा और संगठनात्मक नेतृत्व में बदलाव की प्रक्रिया मजबूत क्यों नहीं हो रही—इन सवालों पर गंभीर चर्चा जरूरी है।
वाम एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी संगठन तत्काल अपनी स्वतंत्र पहचान समाप्त कर दें। एकता की शुरुआत साझा मुद्दों पर साझा संघर्ष से हो सकती है। संयुक्त अभियान, जनमंच और जनसंगठनों की भागीदारी से आपसी विश्वास मजबूत किया जा सकता है और आगे व्यापक राजनीतिक एकता की जमीन तैयार हो सकती है।
नेतृत्व की असली परीक्षा केवल सम्मेलनों, प्रस्तावों और भाषणों से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि वह नई पीढ़ी को कितना आगे बढ़ाता है और व्यापक जनसंघर्ष के लिए व्यक्तिगत तथा संगठनात्मक हितों से कितना ऊपर उठता है।
कभी-कभी सबसे बड़ा राजनीतिक त्याग पद छोड़ना और दूसरे को आगे बढ़ाना होता है। यदि किसी नेता के पीछे हटने से व्यापक वाम एकता मजबूत होती है, तो क्या वह इसके लिए तैयार है—यह सवाल आज गंभीरता से पूछा जाना चाहिए।
अंततः सवाल यह नहीं कि कौन महासचिव बनेगा या किस संगठन का झंडा आगे रहेगा। असली सवाल यह है कि मजदूर-किसान और आम जनता का संघर्ष कितना मजबूत होगा।
वाम नेतृत्व को अब भाषणों से आगे बढ़कर व्यवहार में एकता, आत्मालोचना और नई पीढ़ी के नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
क्रांति सत्ता या कुर्सी की नहीं, बल्कि अहंकार और संगठनात्मक जड़ता के खिलाफ होनी चाहिए।
अब सवाल का जवाब भाषण से नहीं, व्यवहार से देना होगा—क्रांति पार्टी में है या कुर्सी में
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