संवाददाता जाबिर शेख
आजमगढ़ लालगंज उत्तर प्रदेश सरकार और कृषि विभाग भले ही किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया खाद उपलब्ध कराने और पारदर्शी वितरण व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे कर रहे हों, लेकिन लालगंज तहसील क्षेत्र के सोफीपुर में किसानों की परेशानी इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है वही लालगंज तहसील क्षेत्र में कई दुकानदार ऐसे भी हैं जो उड़िया खाद 4:30 सौ से लेकर 500 में किसानों को दे रहे हैं
किसानों का आरोप है कि वे फार्मर आईडी, खतौनी और अन्य जरूरी दस्तावेज लेकर खाद लेने पहुंच रहे हैं, लेकिन उन्हें कथित तौर पर यह कहकर वापस कर दिया जाता है कि “खाद उपलब्ध नहीं है।” ऐसे में सवाल यह है कि जब आम किसान के लिए खाद उपलब्ध नहीं है, तो फिर 25 से 50 बोरी तक यूरिया खाद कुछ लोगों को दिए जाने की चर्चा आखिर किस आधार पर है?
सरकारी दावे और किसानों की हकीकत में इतना बड़ा अंतर क्यों?
किसानों का कहना है कि शासन ने खाद वितरण में पारदर्शिता और पात्र किसानों को प्राथमिकता देने की व्यवस्था बनाई है। इसके बावजूद यदि दस्तावेज पूरे होने के बाद भी किसान खाद के लिए भटक रहे हैं और दूसरी ओर बड़ी मात्रा में खाद उठाए जाने की चर्चा सामने आ रही है, तो जिले के जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसानों का आरोप है कि कागजों में व्यवस्था दुरुस्त बताने से खेतों में खाद नहीं पहुंचती। जमीनी स्तर पर किसानों को खाद मिल रही है या नहीं, इसकी हकीकत जानने के लिए अधिकारियों को महज कार्यालयी रिपोर्टों पर निर्भर रहने के बजाय मौके पर पहुंचकर स्थिति देखनी चाहिए।
स्टॉक रजिस्टर और पीओएस का हिसाब खोलेगा राज?
किसानों ने जिलाधिकारी आजमगढ़ और कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। किसानों का कहना है कि संबंधित खाद विक्रेता के
स्टॉक रजिस्टर
पीओएस मशीन का पूरा रिकॉर्ड
खाद की आवक और बिक्री का विवरण
किन किसानों को कितनी मात्रा में यूरिया दी गई
उन किसानों की फार्मर आईडी और खतौनी
एक व्यक्ति को दी गई खाद की वास्तविक मात्रा
की जांच कराई जाए।
यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का मिलान कराया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि वास्तव में खाद का वितरण नियमों के मुताबिक हुआ या फिर कागजों में कुछ और और जमीन पर कुछ और कहानी है।
अधिकारियों के दावों की भी होनी चाहिए पड़ताल
किसानों का कहना है कि यदि जिले में पर्याप्त यूरिया उपलब्ध होने के दावे किए जा रहे हैं तो सोफीपुर में किसानों को खाद के लिए वापस क्यों लौटना पड़ रहा है? यदि खाद की कमी है तो बड़ी मात्रा में खाद मिलने की चर्चा कैसे सामने आ रही है? और यदि खाद उपलब्ध है तो जरूरतमंद किसान उसके लिए दर-दर क्यों भटक रहा है?
इन सवालों का जवाब सिर्फ बयान जारी करके नहीं, बल्कि मौके की जांच और बिक्री रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिया जाना चाहिए।
किसानों ने मांग की है कि संबंधित अधिकारी सोफीपुर पहुंचकर मौके पर स्टॉक का सत्यापन करें और पीओएस रिकॉर्ड से वास्तविक बिक्री का मिलान कराएं। जांच में यदि किसी भी स्तर पर नियमों की अनदेखी, स्टॉक में गड़बड़ी या वितरण में अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
किसानों का सीधा सवाल—खाद है तो मिल क्यों नहीं रही?
किसानों का कहना है कि सरकार की मंशा किसानों को समय पर सरकारी दर पर खाद उपलब्ध कराने की है। ऐसे में अब निगाहें जिला प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारियों पर हैं कि वे कागजी दावों से आगे बढ़कर सोफीपुर की जमीनी हकीकत सामने लाते हैं या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर खाद उपलब्ध है तो किसान खाली हाथ क्यों लौट रहे हैं, और अगर उपलब्ध नहीं है तो 25 से 50 बोरी खाद मिलने की चर्चा किस आधार पर हो रही है?
किसानों ने पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित जांच कराकर सच्चाई सामने लाने की मांग की है।
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