संवाददाता जाबिर शेख
आजमगढ़ पवई बाजार स्थित एक निजी नर्सिंग होम में प्रसव के दौरान नवजात की मौत के बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया घटना से आक्रोशित परिजनों और ग्रामीणों ने अस्पताल पहुंचकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया तथा संचालिका के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठाई घटना के बाद क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गईं।
जानकारी के अनुसार पवई थाना क्षेत्र के सुम्हाडीह गांव निवासी उमेश कुमार की पत्नी शशिकला को सोमवार रात प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों का आरोप है कि गांव की एएनएम संगीता ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पर्याप्त सुविधा न होने की बात कहकर उन्हें पवई बाजार स्थित पद्मावती नर्सिंग होम भेज दिया, जहां प्रसूता को भर्ती कर लिया गया।
पीड़ित उमेश कुमार ने आरोप लगाया कि नर्सिंग होम में बिना पर्याप्त चिकित्सा संसाधनों और प्रशिक्षित चिकित्सकों के प्रसव कराया गया। उनका कहना है कि प्रसव के दौरान वहां कोई महिला चिकित्सक या प्रशिक्षित नर्स मौजूद नहीं थी। परिजनों द्वारा आपत्ति जताने के बावजूद कथित झोलाछाप चिकित्सक ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। आरोप है कि प्रसव के दौरान नवजात की हालत बिगड़ गई और जन्म के कुछ देर बाद उसकी मौत हो गई।
नवजात की मौत की खबर फैलते ही परिजन आक्रोशित हो उठे। देखते ही देखते सैकड़ों ग्रामीण अस्पताल पहुंच गए और नर्सिंग होम प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। ग्रामीणों का कहना था कि यदि समय रहते महिला को सरकारी अस्पताल रेफर कर दिया गया होता तो शायद नवजात की जान बच सकती थी।
ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात एक महिला स्वास्थ्यकर्मी और उसके पुत्र द्वारा सरकारी अस्पताल से महज 100 मीटर दूरी पर यह अस्पताल संचालित किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि ऐसे अवैध झोलाछाप डॉक्टरों के अस्पतालों में आए दिन प्रसूताओं और नवजातों की जिंदगी जोखिम में डाली जा रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग कार्रवाई करने के बजाय मौन बना हुआ है।
ग्रामीणों ने पद्मावती नर्सिंग होम सहित क्षेत्र में संचालित अन्य अवैध अस्पतालों के खिलाफ भी व्यापक जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
इस संबंध में अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. आलेंद्र कुमार ने बताया कि सरकारी कर्मचारी द्वारा अस्पताल संचालित किया जाना नियमों के विरुद्ध है। मामले की जानकारी मिली है और जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। लेकिन क्षेत्र में यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब ऐसे अवैध झोलाछ डॉक्टर के अस्पतालों में किसी की मृत्युहो ती है तब स्वास्थ्य विभाग नींद से जागता है कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कागजी कार्रवाई हती है
कुछ दिन बाद फिर वही अस्पताल संचालित हो जाता है क्या स्वास्थ्य विभाग और झोलाछाप डॉक्टरों की मिली भगत है
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