जलालाबाद-शाहजहाँपुर। कहते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है, लेकिन जलालाबाद के किसानों के लिए यह फल कंक्रीट और भ्रष्टाचार के मिलावट वाला निकला है। वर्षों के वनवास और विधायक हरिप्रकाश वर्मा की लंबी कागजी तपस्या के बाद, मंडी परिषद ने 14 अक्टूबर 2025 को उदारता दिखाते हुए 61.49 लाख रुपये का एक भारी-भरकम बजट दान किया था। मकसद नेक था कि मंडी समिति के पूर्वी गेट से फर्रुखाबाद मार्ग तक किसानों के लिए मखमल जैसी सड़क बिछाना।
जिस सड़क के लिए सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक ने सालों पसीना बहाया, बजट पास होते ही उस पर भ्रष्टाचार की पॉलिश चढ़नी शुरू हो गई। लगभग एक किलोमीटर की इस सड़क को बनाने में ऐसी जादुई तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, जिसे देखकर लगता है कि सड़क चलने के लिए नहीं, बल्कि अगली बारिश में बह जाने के लिए बनाई जा रही है। अगर यह सड़क छः महीने भी टिक जाए, तो इसे जलालाबाद का आठवां अजूबा और ठेकेदार की महान मेहरबानी समझा जाना चाहिए।
हैरानी की बात तो यह है कि सरकारी खजाने से 61,49,000 रुपये निकल चुके हैं, लेकिन धरातल पर गुणवत्ता का नामोनिशान नहीं है। ऐसा लगता है कि न कोई जाँच करने वाला है, न कोई देखरेख करने वाला। सारा सिस्टम प्रभु कृपा और साहबों की चुप्पी के सहारे चल रहा है। क्या यह पैसा किसानों की सहूलियत के लिए था या ठेकेदारों और बाबुओं की दिवाली मनाने के लिए?
मंडी समिति के गेट से शुरू हुआ यह काम, पूरा होने से पहले ही अपनी बदहाली की कहानी चीख-चीख कर सुना रहा है। जब बजट करोड़ों के करीब हो और काम दो कौड़ी का, तो सवाल उठना लाजमी है। क्या शासन-प्रशासन के पास इतना वक्त है कि वह इस सफेद हाथी जैसी बन रही सड़क की गुणवत्ता की जांच करा सके? या एक बार फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर यह सड़क गड्ढों में तब्दील हो जाएगी और जवाबदेही फाइलों में दब जाएगी।
अजय सिंह की रिपोर्ट शाहजहांपुर
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