13 अप्रैल का वह दिन जब जनरल डायर कि गोलियों से चीख उठा था हिंदुस्तान




लगभग 107 बरस पहले जब पूरा हिंदुस्तान सहम गया था, मौत भी जिंदगी की भीख मांगने लगी थी और धरती ने इंसानी लाशों से अपनी कोख को ढक लिया था। 13 अप्रैल 1919 को बर्बरता की ऐसी पराकाष्ठा पार की गई कि आज भी दीवारों पर उसके निशान नजर आते हैं। आज भी वो निशान देखकर हर कोई सहम जाता है। यह कहानी है जलियांवाला बाग नरसंहार की, जब अंग्रेजों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ये बात और है कि ब्रिटेन ने आज तक भारत में किए अपने इस घृणास्पद कृत्य के लिए माफी नहीं मांगी है।

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर शहर में स्थित जलियांवाला बाग में हुई घटना कोई कहानी नहीं, बल्कि वो जख्म है, जो बार-बार यह कहता है कि अंग्रेजी हुकूमत की उस खौफनाक पराकाष्ठा को कभी भूलो मत। कभी माफ मत करो। यह वो इतिहास है, जिसे हम और आप भुला नहीं सकते। यह वो इतिहास है, जिसे कोई झुठला नहीं सकता और कोई बरगला नहीं सकता।


रिपोर्ट विशेष ए के सिंह परमहंस।

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