नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 35 पर महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए पुलिस को साफ निर्देश दिए हैं कि गिरफ्तारी कोई रूटीन या अनिवार्य कदम नहीं है। यह पुलिस अधिकारी का
वैधानिक विवेकाधिकार
मात्र है, जिसका इस्तेमाल केवल जांच के लिए बिल्कुल आवश्यक होने पर ही किया जाना चाहिए। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि 7 वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में आरोपी को पहले धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना
नियम है, जबकि गिरफ्तारी अपवाद
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले में 15 जनवरी 2026 को दिए फैसले में स्पष्ट किया कि पुलिस किसी व्यक्ति को केवल पूछताछ या सवाल-जवाब के लिए गिरफ्तार नहीं कर सकती। गिरफ्तारी तभी जायज होगी जब जांच प्रभावी रूप से बिना हिरासत के आगे न बढ़ सके।
कोर्ट की मुख्य बातें और दिशानिर्देश
-धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना 7 साल तक की सजा वाले संज्ञेय अपराधों में अनिवार्य नियम है।
धारा 35(1)(b) और 35(6) के तहत गिरफ्तारी की शक्ति पुलिस की व्यक्तिगत सुविधा नहीं, बल्कि सख्त वस्तुनिष्ठ आवश्यकता पर आधारित होनी चाहिए।
पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले खुद से पूछना होगा: "क्या गिरफ्तारी वाकई जरूरी है?" गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।
यदि नोटिस का पालन हो जाता है, तो गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। नोटिस के बाद नए तथ्य या परिस्थितियां सामने आने पर ही गिरफ्तारी संभव।
गिरफ्तारी जांच में सहायता के लिए है, न कि रूटीन प्रक्रिया। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए है।
पुराने अर्नेश कुमार (2014) फैसले की भावना को BNSS में मजबूत किया गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा (एमिकस क्यूरी) ने कोर्ट को बताया कि नोटिस को केवल गिरफ्तारी के कारण लिखकर टाला नहीं जा सकता। पीठ ने सहमति जताते हुए कहा कि जांच बिना गिरफ्तारी के भी जारी रह सकती है और पुलिस को सावधानी बरतनी होगी।
यह फैसला पुलिस की मनमानी रोकने और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करने वाला है। जांच एजेंसियों के लिए अब गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होगी, न कि पहला कदम। इससे अनावश्यक हिरासत और जेल में बंदी कम होने की उम्मीद है।
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