एफसीआई के 87 बिलों में 21.70 लाख रुपये की कथित अनियमितता, हाईकोर्ट के अधिवक्ता पर मुकदमा दर्ज




आजमगढ़। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) में विधिक शुल्क के नाम पर कथित रूप से फर्जी एवं कूटरचित बिल प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता विजय कुमार दीक्षित के खिलाफ आजमगढ़ में प्राथमिकी दर्ज की गई है। निगम की जांच में 87 बिलों के आधार पर कुल 21 लाख 70 हजार 586 रुपये का कथित अनधिकृत भुगतान प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। भारतीय खाद्य निगम के मंडल प्रबंधक बजरंग लाल अग्रवाल की शिकायत पर 27 अक्टूबर 2026 को मुकदमा दर्ज किए जाने का उल्लेख है।
भारतीय खाद्य निगम के मंडल प्रबंधक ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आजमगढ़ को दिए गए प्रार्थना-पत्र में आरोप लगाया है कि अधिवक्ता ने वर्ष 2017 से 2021 के बीच विधिक शुल्क के नाम पर ऐसे बिल प्रस्तुत किए, जिनमें गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। शिकायत के अनुसार, निगम के क्षेत्रीय कार्यालय लखनऊ की ओर से मामले की विस्तृत जांच की गई थी।
यह जांच इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल रिट याचिका संख्या Writ C No. 41735/2024 में 19 मार्च 2025 को पारित आदेश के अनुपालन में कराई गई थी। जांच के दौरान अधिवक्ता की ओर से प्रस्तुत कुल 87 विधिक शुल्क बिलों का परीक्षण किया गया। इसके लिए निगम के मंडल कार्यालय आजमगढ़ में उपलब्ध अभिलेखों, न्यायालय की वेबसाइट पर मौजूद वादों के विवरण और न्यायालय से प्राप्त संबंधित दस्तावेजों का सहारा लिया गया।
48 बिलों में 13.94 लाख रुपये के भुगतान पर सवाल
निगम की जांच रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षण किए गए 87 बिलों में से 48 बिल ऐसे पाए जाने का दावा किया गया है, जो कथित तौर पर अस्तित्व में नहीं होने वाले वादों से संबंधित थे अथवा जिनमें संबंधित अधिवक्ता निगम की ओर से पैरवी करने के लिए अधिकृत नहीं थे। इन 48 बिलों के आधार पर कुल 13 लाख 94 हजार 46 रुपये का भुगतान किए जाने को जांच में कथित अनियमितता के रूप में चिह्नित किया गया।

शिकायत में उदाहरण देते हुए कहा गया है कि Writ A No. 2027/1994, भारतीय खाद्य निगम मजदूर संघ बनाम एफसीआई से संबंधित बिल में अनियमितता सामने आई। निगम के अनुसार, उपलब्ध अभिलेखों में यह मामला हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से संबंधित था और उसमें निगम की ओर से अधिवक्ता मोहम्मद रजा खान पैरवी कर रहे थे। इसके बावजूद विजय कुमार दीक्षित की ओर से संबंधित मामले का बिल प्रस्तुत कर भुगतान प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है।
इसी प्रकार Writ A No. 69996/2016, अशोक कुमार यादव बनाम एफसीआई के संबंध में निगम ने अपने अभिलेखों और न्यायालय की वेबसाइट पर वाद का विवरण उपलब्ध नहीं होने की बात कही है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इसके बावजूद उक्त वाद संख्या के आधार पर बिल प्रस्तुत किया गया और भुगतान प्राप्त किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य वादों से संबंधित बिलों में भी अनियमितताएं मिलने का दावा किया गया है।
39 बिलों में निर्धारित शुल्क से अधिक राशि मांगने का आरोप
जांच में शेष 39 बिलों का भी परीक्षण किया गया। निगम की शिकायत के अनुसार, इन मामलों में अधिवक्ता संबंधित वादों में निगम की ओर से नियुक्त थे, लेकिन बिलों में निर्धारित विधिक शुल्क दरों से अधिक राशि का दावा किए जाने की बात सामने आई।
शिकायत में प्रभावी सुनवाई, विविध प्रार्थना-पत्र, कॉन्फ्रेंस, फाइल निरीक्षण, पेपर बुक तैयार करने, टाइपिंग, पूरक शपथपत्र तथा लिखित विधिक राय जैसे मदों में शुल्क लिए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। निगम का कहना है कि जांच के दौरान इन मदों के समर्थन में आवश्यक अभिलेख, कार्य का प्रमाण अथवा संबंधित निर्देश उपलब्ध नहीं पाए गए।
Writ C No. 65485/2013 और Writ C No. 65340/2013 से संबंधित बिलों का उदाहरण देते हुए निगम ने दावा किया है कि कई मदों में भुगतान की मांग की गई, लेकिन उपलब्ध अभिलेखों के परीक्षण में संबंधित राशि को निर्धारित नियमों के तहत अनुमन्य नहीं पाया गया।
इसके अलावा कुछ बिलों में जिन तारीखों पर प्रभावी सुनवाई का शुल्क लिया गया, उन तारीखों पर संबंधित मामलों की सुनवाई होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने की बात भी शिकायत में कही गई है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, इन 39 बिलों में कुल 7 लाख 76 हजार 540 रुपये की राशि को निर्धारित शुल्क से अधिक दावा कर प्राप्त की गई राशि बताया गया है।
कुल 21.70 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता
भारतीय खाद्य निगम की ओर से दी गई शिकायत में दोनों श्रेणियों की राशि का विवरण प्रस्तुत किया गया है। इसके अनुसार, 48 बिलों में 13,94,046 रुपये तथा 39 बिलों में 7,76,540 रुपये की कथित अनियमितता पाई गई। इस प्रकार कुल 87 बिलों के आधार पर 21,70,586 रुपये के कथित अनधिकृत भुगतान का आरोप लगाया गया है।
निगम का कहना है कि कथित अनियमित भुगतान से उसे वित्तीय क्षति हुई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गलत बिल तैयार कर प्रस्तुत किए गए और उनके आधार पर निगम से धनराशि प्राप्त की गई। इसी आधार पर मामले को आपराधिक कृत्य बताते हुए पुलिस से कार्रवाई की मांग की गई है।
शिकायत के मुताबिक, अधिवक्ता को अपना पक्ष रखने के लिए कई अवसर दिए गए थे। निगम ने 15 दिसंबर 2025 को विस्तृत विवरण के साथ जवाब मांगा। इसके बाद 24 फरवरी 2026 को भुगतान संबंधी जानकारी उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख है। शिकायत में 6 मार्च, 19 मार्च, 10 अप्रैल और 5 मई 2026 को भी पक्ष रखने के अवसर दिए जाने की बात कही गई है।
इसके बाद 16 जून 2026 को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए 22 जून 2026 की तारीख निर्धारित किए जाने का उल्लेख है। निगम के अनुसार, अधिवक्ता ने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया।
मंडल प्रबंधक बजरंग लाल अग्रवाल ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को दिए गए प्रार्थना-पत्र में कथित धोखाधड़ी, कूटरचना, कूटरचित दस्तावेजों को वास्तविक बताकर इस्तेमाल करने तथा अन्य संबंधित आपराधिक कृत्यों की जांच कर लागू कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई करने की मांग की है।
शिकायत के साथ भारतीय खाद्य निगम का 8 सितंबर 2026 का आदेश, 10 सितंबर 2026 का मांग नोटिस तथा संबंधित नोटिस और पत्राचार के दस्तावेज संलग्न किए जाने का उल्लेख है।
फिलहाल, मामले में लगाए गए आरोप शिकायत और निगम की जांच के निष्कर्षों पर आधारित हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि, अधिवक्ता का पक्ष और पुलिस विवेचना के निष्कर्ष सामने आना बाकी है। मामले में आगे की कार्रवाई पुलिस जांच के आधार पर तय होगी।

Post a Comment

Previous Post Next Post