जौनपुर राजनीति के पुरोधा और जौनपुर रियासत के 11वें राजा यादवेंद्र दत्त दुबे की 27वीं पुण्यतिथि बुधवार को मनाई जाएगी। नौ सितंबर 1999 को निधन के बाद 27 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन राजनीति में उनके योगदान और व्यक्तित्व की यादें आज भी लोगों के बीच ताजा हैं। राजा यादवेंद्र दत्त दुबे भारतीय जनसंघ और भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे और उत्तर प्रदेश में आरएसएस के प्रभारी की जिम्मेदारी भी संभाली।
सात दिसंबर 1918 को जन्मे राजा यादवेंद्र दत्त दुबे अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता, वाकपटुता और राजनीतिक कौशल के लिए जाने जाते थे। हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत पर उनकी मजबूत पकड़ थी। विज्ञान और ज्योतिष का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। वह चार बार विधायक और दो बार सांसद चुने गए। उत्तर प्रदेश विधानसभा में उन्होंने नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली।
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने हवेली में रुककर लड़ा था चुनाव
राजा यादवेंद्र दत्त दुबे का जनसंघ के शीर्ष नेताओं से बेहद करीबी संबंध था। वर्ष 1963 के उपचुनाव में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से चुनाव लड़ने आए थे और करीब एक माह तक राजा साहब की हवेली में रुके थे। हालांकि उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
राज हवेली में आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’, भाऊराव देवरस, नानाजी देशमुख, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और कल्याण सिंह जैसे दिग्गज नेताओं का आना-जाना लगा रहता था।
लोकसभा में वाकपटुता पर बजीं तालियां
राजा साहब की वाकपटुता का एक प्रसंग आज भी चर्चित है। राज पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और उनके करीबी रहे डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला के अनुसार, एक बार राजा यादवेंद्र दत्त लोकसभा में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बोल रहे थे। उनकी बातों को पूरा सदन एकाग्रता से सुन रहा था। निर्धारित समय समाप्त होने पर जब लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें रोकना चाहा तो अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने आग्रह कर अपना समय उन्हें दे दिया।
इसी दौरान कांग्रेस नेता स्टीफेन की टोका-टाकी पर राजा साहब ने भोजपुरी अंदाज में जवाब दिया। उनके इस चुटीले जवाब के बाद सदन में ठहाके गूंज उठे और तालियां बजने लगीं।
1962 में जुलूस ने खींचा था देश-दुनिया का ध्यान
वर्ष 1962 में सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते समय राजा यादवेंद्र दत्त के समर्थन में राज हवेली से कलेक्ट्रेट तक विशाल जुलूस निकला था। बताया जाता है कि इस जुलूस को बीबीसी ने भी कवर किया था। बीबीसी की रिपोर्ट में जौनपुर के राजा के जुलूस में उमड़ी भीड़ का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटे थे कि वहां तिल रखने तक की जगह नहीं थी।
1957 में पहली बार पहुंचे विधानसभा
राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने वर्ष 1957 में जनसंघ के टिकट पर जौनपुर सदर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा में कदम रखा। वर्ष 1962 में उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता हरगोविंद सिंह को पराजित किया और इसके बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए गए। वर्ष 1967 में बरसठी से विधायक चुने गए और गड़वारा से भी एक बार विधानसभा पहुंचे।
आपातकाल के दौरान वर्ष 1977 में उन्हें वाराणसी की जेल में बंद किया गया था। इसके बाद उन्होंने जौनपुर लोकसभा सीट से वर्ष 1977 और 1989 में चुनाव जीतकर संसद में प्रतिनिधित्व किया।
ज्योतिषी की भविष्यवाणी भी बनी चर्चा का विषय
राजा यादवेंद्र दत्त दुबे के राज ज्योतिषी पंडित मथुरा प्रसाद उपाध्याय से जुड़ा एक प्रसंग भी चर्चित रहा। बताया जाता है कि उनकी कुंडली बनाते समय ज्योतिषी ने कहा था कि जिस दिन उनके जीवन में नौ अंक सबसे अधिक प्रभावी होगा, वही उनके जीवन का अंतिम दिन होगा। संयोग से नौ सितंबर 1999 को उनका निधन हुआ। तारीख, महीना और वर्ष में नौ अंक की मौजूदगी को लेकर यह प्रसंग लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा में रहा।
राजा यादवेंद्र दत्त दुबे का जीवन जौनपुर की राजनीति और जनसंघ की शुरुआती राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। उनकी 27वीं पुण्यतिथि पर राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।
मिडिया रिपोर्ट ए के सिह परमहंस
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