चेहल्लुम-ए-शोहदाए कर्बला का मरकज़ी जुलूस, गूंजे लब्बैक या हुसैन के नारे




संवाददाता मोहम्मद यासिर सरायमीर 

आजमगढ़ सरायमीर चेहल्लुम-ए- शोहदाए कर्बला और अरबईन-ए-हुसैनी के अवसर पर सरायमीर में अंजुमन तंजीम-ए-हुसैनी के तत्वावधान में मरकज़ी जुलूस-ए-अज़ा निकाला गया। जुलूस में बड़ी संख्या में अज़ादारों, ज़ायरीनों और अकीदतमंदों ने शिरकत कर इमाम हुसैन (अ.) और शोहदाए कर्बला को खिराज-ए-अक़ीदत पेश किया। कार्यक्रम की शुरुआत चौक स्थित वक्फ इमामबाड़ा तस्कीन-ए-ज़ैनब में आयोजित मजलिस-ए-अज़ा से हुई, जहां उलमा ने वाक़िया-ए-कर्बला और इमाम हुसैन (अ.) की कुर्बानियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मौलाना मासूम असगर मारूफी ने कहा कि कर्बला केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि हक़ और बातिल के बीच अंतर स्पष्ट करने वाला महान संदेश है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ.) ने इंसाफ, इंसानियत और दीन की सरबुलंदी के लिए अपनी और अपने साथियों की कुर्बानी पेश की।

मजलिस के बाद शबीहे ज़ुलजनाह, ताबूत, अलम-ए-मुबारक और ताज़ियों के साथ जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से निकला। अज़ादार नौहाख्वानी और सीना-ज़नी करते हुए आगे बढ़ते रहे। रास्ते में विभिन्न स्थानों पर सबील और लंगर की व्यवस्था भी की गई।

रौज़ा अली आशिक़ान के पास मौलाना कौसर रज़ा नक़वी ने कहा कि इमाम हुसैन (अ.) ने कम संख्या में होने के बावजूद ज़ुल्म के सामने सिर नहीं झुकाया और पूरी मानवता को हक़ पर डटे रहने का संदेश दिया। वहीं मेन रोड पर मौलाना शारिब अब्बास ने हज़रत ज़ैनब (स.) के सब्र, इस्तेक़ामत और पैग़ाम-ए-हुसैनी को दुनिया तक पहुंचाने में उनके अहम किरदार पर प्रकाश डाला।

जुलूस के समापन पर शोहदाए कर्बला के 72 शहीदों के शबीहे ताबूत की ज़ियारत कराई गई। इस दौरान सैयद ज़ीशान अली निज़ामाबादी ने कहा कि नई पीढ़ी को कर्बला के संदेश, इमाम हुसैन (अ.) की सीरत और अहलेबैत की शिक्षाओं से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जुलूस की निज़ामत सागर आज़मी और मोहम्मद हुसैन सरायमेरी ने की। अंत में आयोजकों ने सभी अज़ादारों, ज़ायरीनों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।

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