संवाददाता जाबिर शेख
आजमगढ़। जिले में लालगंज कथित रूप से मानकों के विपरीत संचालित अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों के खिलाफ शिकायत करने वाले लोगों को अब कार्रवाई का इंतजार कम और शिकायत “समझौते” या “निस्तारण” की चिंता ज्यादा सताने लगी है। ऐसा ही एक मामला आरजीएस पोर्टल के माध्यम से की गई शिकायत को लेकर सामने आया है, जिसने आजमगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसके द्वारा एक कथित अवैध तरीके से संचालित अस्पताल के संबंध में आरजीएस के माध्यम से शिकायत किए जाने के बाद सीएमओ कार्यालय से कुछ लोगों को शिकायतकर्ता का मोबाइल नंबर उपलब्ध कराया गया और उससे बातचीत कर मामले का समाधान कराने के लिए कहा गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि किसी अस्पताल के संचालन को लेकर गंभीर शिकायत प्राप्त होती है तो विभाग का काम मौके पर जांच कराकर नियमानुसार कार्रवाई करना है या फिर शिकायतकर्ता से संपर्क कर शिकायत का “समाधान” कराने की कोशिश करना?
शिकायत की जांच जरूरी या शिकायतकर्ता से बातचीत?
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आरजीएस जैसी सरकारी शिकायत प्रणाली में दर्ज शिकायतों का निस्तारण निष्पक्ष जांच और दस्तावेजी कार्रवाई के आधार पर होना चाहिए या शिकायतकर्ता से बातचीत के जरिए?
शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि अस्पताल वास्तव में नियमों के अनुरूप संचालित हो रहा है तो विभाग द्वारा जांच कराकर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। वहीं यदि अस्पताल में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित संचालक के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
सीएमओ कार्यालय की भूमिका पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले ने जिले के स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर शिकायतकर्ता का नंबर कार्यालय से किन लोगों को दिया गया? उन्हें शिकायतकर्ता से संपर्क करने का अधिकार किसके निर्देश पर मिला? शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया क्या थी? क्या इस संबंध में कोई लिखित जांच कराई गई? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—क्या शिकायतकर्ता की शिकायत की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच हुई?
इन सवालों के जवाब सामने आना बेहद जरूरी है, क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी शिकायतें सीधे आम जनता के जीवन और सुरक्षा से जुड़ी होती हैं।
“शिकायत दबाने” की कोशिश तो नहीं?
शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला महज एक शिकायत के निस्तारण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी जांच का विषय बनेगा कि सरकारी शिकायत प्रणाली में दर्ज शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत जानकारी आखिर बाहर कैसे पहुंची और उसे अन्य लोगों तक किस उद्देश्य से पहुंचाया गया।
अब लोगों की नजर इस बात पर है कि सीएमओ कार्यालय इस मामले में वास्तविक जांच कराता है या फिर बातचीत के जरिए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि संबंधित अस्पताल के संचालन की भौतिक जांच, पंजीकरण, चिकित्सकों की योग्यता, स्टाफ, अग्नि सुरक्षा, जैव-चिकित्सीय कचरा प्रबंधन तथा अन्य आवश्यक मानकों की जांच कराकर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। साथ ही आरजीएस शिकायत के निस्तारण की प्रक्रिया की भी जांच हो, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शिकायत पर वास्तव में कार्रवाई हुई या केवल कागजी खानापूर्ति की गई।
अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले में पारदर्शी जांच कर दूध का दूध और पानी का पानी करता है या फिर शिकायतों के निस्तारण के नाम पर वही पुरानी व्यवस्था जारी रहती है।
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