आजमगढ़ में स्वास्थ्य माफिया का जाल! कार्रवाई के दावे बेअसर, मौतों के बाद भी नहीं थम रहा खेल




संवाददाता जाबिर शेख 

आजमगढ़। जनपद में स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिले के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में कथित झोलाछाप डॉक्टरों, बिना पंजीकरण संचालित चिकित्सा केंद्रों और मानकों को दरकिनार कर चलाए जा रहे निजी अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई के दावे तो लगातार सामने आते हैं, लेकिन इसके बावजूद ऐसे संस्थानों का संचालन पूरी तरह रुकता नजर नहीं आ रहा है।
लालगंज, देवगांव, महराजगंज, सरायमीर, रानी की सारी, निजामाबाद, बिलरियागंज समेत कई क्षेत्रों में निजी चिकित्सा केंद्रों को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार शिकायतें उठती रही हैं। आरोप है कि कुछ स्थानों पर पर्याप्त योग्यता और आवश्यक चिकित्सकीय संसाधनों के अभाव में मरीजों का उपचार किया जा रहा है। गंभीर मरीजों के मामलों में स्थिति बिगड़ने तथा उपचार के दौरान मौत होने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक द्वारा प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने और अवैध चिकित्सा संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जाने के बावजूद यदि जिले में इस तरह के केंद्र संचालित हो रहे हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि निगरानी व्यवस्था में कमी कहां है,

कागजों में कार्रवाई या जमीन पर भी असर?

स्वास्थ्य विभाग समय-समय पर छापेमारी, निरीक्षण, सीलिंग और मुकदमा दर्ज कराने जैसी कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करता है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ मामलों में कार्रवाई के बाद भी संबंधित संस्थान दोबारा संचालित होने लगते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कार्रवाई के बाद विभाग द्वारा दोबारा निरीक्षण किया जाता है या नहीं?

यदि कोई अस्पताल अथवा क्लीनिक बिना वैध पंजीकरण के संचालित पाया जाता है तो उसे बंद कराने के बाद उसके दोबारा खुलने की जिम्मेदारी किसकी होगी? वहीं यदि किसी चिकित्सा केंद्र में उपचार के दौरान मरीज की मौत होती है तो मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है, यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
मरीजों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए स्थानीय क्लीनिक और छोटे अस्पताल ही प्राथमिक उपचार का सहारा होते हैं। ऐसे में यदि बिना पर्याप्त योग्यता, संसाधन अथवा आवश्यक मानकों के मरीजों का इलाज किया जा रहा है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ सकता है।
जनपदवासियों ने मांग की है कि स्वास्थ्य विभाग जिले के सभी निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिक, पैथोलॉजी और ऑपरेशन केंद्रों का विशेष अभियान चलाकर सत्यापन कराए। संस्थान का पंजीकरण, चिकित्सक की योग्यता, स्टाफ, अग्नि सुरक्षा, मेडिकल उपकरण, ऑपरेशन की सुविधा और मरीजों के उपचार से जुड़े आवश्यक मानकों की जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

सीएमओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे सवाल,

लगातार सामने आ रही शिकायतों के बीच मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय की निगरानी और कार्रवाई की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। लोगों का सवाल है कि यदि विभाग को अवैध चिकित्सा संस्थानों की जानकारी शिकायतों के माध्यम से मिल रही है, तो कार्रवाई में देरी क्यों होती है? और यदि कार्रवाई की जाती है तो उसके बाद दोबारा उसी संस्थान के संचालन पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग पाती?
अब जरूरत केवल प्रेस विज्ञप्तियों और कार्रवाई के दावों की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर स्थायी कार्रवाई और नियमित निगरानी की है। स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि जिले में कितने निजी चिकित्सा संस्थान पंजीकृत हैं, कितनों की जांच हुई, कितनों के खिलाफ कार्रवाई हुई और कार्रवाई के बाद कितने संस्थान दोबारा संचालित पाए गए।
जनता की जिंदगी से जुड़ा मामला होने के कारण स्वास्थ्य विभाग से उम्मीद है कि वह इन सवालों का स्पष्ट जवाब देगा और जिले में अवैध एवं मानकविहीन चिकित्सा व्यवस्था के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाएगा।

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