वाराणसी के जैतपुरा थाना क्षेत्र के सरैन्या मुस्लिमपुरा वार्ड नंबर 87 में एक बंजर ज़मीन पर रातों-रात बाउंड्री कर कब्ज़ा किए जाने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पार्षद प्रतिनिधि राज खान ने प्रभाव का इस्तेमाल कर ज़मीन पर कब्ज़ा कराया। हालांकि दूसरी ओर दावा किया जा रहा है कि ज़मीन खरीदी गई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि ज़मीन खरीदी गई है तो उसका वास्तविक मालिक कौन है और वर्षों से बंजर पड़ी भूमि का स्वामित्व किसके नाम दर्ज है?स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस ज़मीन पर वर्षों से किसी का दावा नहीं था, उस पर अचानक रातों-रात बाउंड्री खड़ी कर दी गई। विरोध करने पर कथित तौर पर पैसा और पावर का रौब दिखाते हुए कहा गया कि ज़मीन लाखों रुपये में खरीदी गई है।इलाके के बुज़ुर्गों और बिरादरी के चौधरियों ने पंचायत कर विवाद को शांत करने की कोशिश की, जिसके बाद दोनों ओर दो-दो फीट का रास्ता देने पर सहमति बनी। लेकिन रास्ता मिल जाने से एक बड़ा सवाल खत्म नहीं होता—आख़िर बंजर ज़मीन पर कब्ज़े की अनुमति किसने दी?स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज़ है कि क्या इस पूरे मामले में नगर निगम और स्थानीय पुलिस की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए? यदि ज़मीन सरकारी या सार्वजनिक श्रेणी की है, तो क्या बिना राजस्व अभिलेखों की जांच के उस पर निर्माण कराया जा सकता है? और यदि निजी है, तो उसके स्वामित्व के दस्तावेज़ सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?कहते हैं कि कानून सबके लिए बराबर होता है। लेकिन जब बंजर ज़मीन भी रातों-रात चारदीवारी में बदल जाए, तो सवाल उठना लाज़िमी है—क्या बुलडोज़र सिर्फ़ गरीबों की झोपड़ियों तक ही सीमित है, या फिर प्रभावशाली लोगों की चारदीवारी तक भी कानून की नज़र पहुंचेगी? अब सबकी निगाह प्रशासन पर है कि वह इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सच सामने लाता है या फिर यह मामला भी चर्चाओं तक ही सीमित रह जाएगा।
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