2026 के आंकड़े एक बार फिर आम आदमी की जेब पर बढ़ते बोझ की कहानी बयां कर रहे हैं। खुदरा महंगाई दर भले ही 3.4% पर दिख रही हो, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा कड़वी है। खासकर रसोई का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है, जहां खाने के तेल की कीमतें ₹182 प्रति लीटर के पार पहुंच गई हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हर घर की थाली से समझौते की मजबूरी बन चुका है।
खाने के तेल में यह उछाल अचानक नहीं आया। पाम ऑयल की महंगी सप्लाई और आयात में गिरावट ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। भारत पहले से ही खाद्य तेल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, लेकिन सरकार की ओर से समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए। नतीजा—महंगाई का सीधा वार आम जनता पर।
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ खाना पकाने तक नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कई चीजों पर दिखने लगा है। साबुन, बिस्किट, पैकेज्ड फूड—सबकी कीमतें धीरे-धीरे ऊपर खिसक रही हैं। यानी महंगाई अब सिर्फ थाली तक नहीं, पूरे घर के खर्च को जकड़ चुकी है।
ऊपर से गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतें आग में घी डालने का काम कर रही हैं। एक तरफ महंगा तेल, दूसरी तरफ महंगी रसोई गैस—आम आदमी आखिर जाए तो जाए कहां? सरकार की नीतियों पर सवाल उठना लाजमी है। क्या महंगाई पर नियंत्रण सिर्फ आंकड़ों तक सीमित रह गया है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आयात नीति, स्टॉक मैनेजमेंट और घरेलू उत्पादन को लेकर ठोस रणनीति नहीं बनाई गई, तो आने वाले महीनों में हालात और बिगड़ सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब जनता आज ही परेशान है, तो भविष्य की योजनाओं का क्या मतलब?
महंगाई अब “डायन” जैसी लगने लगी है जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके आम आदमी की कमाई को खा रही है। और सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पर लगाम लगाने की कोशिशें नाकाफी नजर आ रही हैं।
रिपोर्ट विशेष ए के सिंह परमहंस।
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